श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय 13, श्लोक 28


 समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ 13.28

 शब्दार्थ

समम् — समान रूप से     सर्वेषु — सभी में   भूतेषु — समस्त प्राणियों में  तिष्ठन्तम् — स्थित, विराजमान   परमेश्वरम् — परमात्मा, भगवान  विनश्यत्सु — नाशवान शरीरों में   अविनश्यन्तम् — अविनाशी, जिसका कभी नाश नहीं होता यः — जो   पश्यति — देखता है, अनुभव करता है   सः — वही  पश्यति — वास्तव में देखता है। 

अर्थ

जो इंसान हर जीव में बराबर बसा हुआ परमेश्वर देखता है, और जो नश्वर शरीरों के भीतर भी उस अमर आत्मा का अनुभव करता है—असल में उसी ने ठीक से देखा है, वही सच्चा जानने वाला है।

व्याख्या

यह दुनिया तरह-तरह के शरीरों से भरी है—कोई अमीर है तो कोई गरीब, कोई इंसान, कोई जानवर, कोई पढ़ा-लिखा, कोई अनपढ़। बाहर से सब अलग दिखते हैं: रूप, रंग, जाति, स्थिति सब बदल जाती है। मगर इन सबके भीतर जो आत्मा बसी है, वह एक ही है।

शरीर जन्म लेता है, उम्र पाता है, बूढ़ा होता है और आखिर में मिट जाता है। लेकिन आत्मा का न जन्म है, न मृत्यु। वो हमेशा एक-सी, स्थिर और अमर रहती है।

जो लोग सिर्फ शरीर को देखते हैं, उनके लिए भेदभाव पैदा होना लाजिमी है। लेकिन जिसने हर जीव के भीतर उसी एक परमात्मा को देख लिया, उसे फर्क करना छूट जाता है। न ऊँच-नीच का एहसास, न किसी से नफरत, न घमंड—सब खत्म हो जाता है।

इस श्लोक में भगवान हमें नई नजर दे रहे हैं। वो कहते हैं—अगर मुझे पाना है, तो मेरी तलाश मंदिर में रखी मूर्तियों तक सीमित मत रखो। हर किसी के दिल में मुझे देखो। जैसे एक सूरज कई तालाबों में साफ दिखाई देता है, वैसे ही एक ही परमात्मा हर प्राणी के भीतर बसा है।

साधक जब इस बात को दिल से मान लेता है, तो फिर अपने पराए, दोस्त-दुश्मन, अमीर-गरीब में फर्क करना बंद कर देता है। उसके व्यवहार में अपने-आप करुणा, प्रेम और इज्जत आ जाती है, क्योंकि अब उसे हर किसी में वही प्रभु दिखाई देते हैं।

असल में, यही समदृष्टि सच्ची भक्ति और असली ज्ञान का निशान है। जो उस अविनाशी परमात्मा को हर नश्वर शरीर में देख लेता है, वही भगवान की नजर में योग्य है।

सार:

सार बात ये है—जो हर जीव में हमेशा एक-जैसे, अटल और अमर परमात्मा को देखता है, वही असली जानने वाला है, उसके लिए तो सारा संसार भगवान का ही रूप बन जाता है।


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