निर्जला भीमसेनी एकादशी 25 जून 2026 सभी भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएँ

 


निर्जला भीमसेनी एकादशी 25 जून 2026

🌿 श्रीहरि की असीम कृपा आप सभी पर बनी रहे। निर्जला भीमसेनी एकादशी के पावन व्रत की समस्त भक्तों एवं श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएँ।

श्री विष्णु भगवान आप सभी को भक्ति, सुख, शांति एवं मंगलमय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करें।

 

जय श्री कृष्ण

 

निर्जला यानी भीमसेनी एकादशी का महत्व

 

ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला या भीमसेनी एकादशी कहते हैं। वैष्णवों के लिए ये एकादशी बहुत खास मानी जाती है। इसका ज़िक्र खासतौर से पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।

 

इसे  निर्जला क्यों बोलते हैं?

 

निर्जला शब्द का मतलब हैबिल्कुल बिना पानी के। इस दिन व्रती सिर्फ अन्न का ही नहीं बल्कि पानी का भी त्याग करते हैं। बाकी एकादशियों में आप फलाहार या पानी ले सकते हैं, लेकिन निर्जला एकादशी में सूरज निकलने से लेकर अगले दिन पारण तक, पानी भी नहीं पीना होता। इसी वजह से इसे निर्जला एकादशी कहते हैं।

 

इसे  भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?

 

महाभारत के पांडवों में सबसे ताकतवर भीम थे। उन्हें बहुत तेज़ भूख लगती थी, इसलिए साल की बाकी एकादशियों के व्रत कर पाना उनके लिए मुश्किल था। तब भीमसेन ने महर्षि व्यास से पूछाऐसा कौन सा उपाय है जिससे सारी एकादशियों का पुण्य एक साथ मिल जाए?  व्यासजी ने कहा, अगर सालभर की एकादशी नहीं कर सकते तो सिर्फ ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना अन्न और जल के व्रत करो। इससे सभी एकादशियों का फल मिलेगा। भीमसेन ने पूरी श्रद्धा से ये व्रत किया। तभी से ये व्रत उनके नाम से भीमसेनी एकादशी कहलाने लगा।

 

इस व्रत की कथा किसने सुनाई?

 

असल में, ये उपदेश महर्षि वेदव्यास ने खुद भीमसेन को दिया था। बाद में यही संवाद पुराणों में लिखा गया। इसलिए निर्जला एकादशी की कथा का मुख्य आधार व्यास और भीमसेन का यही संवाद है।

 

ये परंपरा कब से चली रही है?

 

निर्जला एकादशी कोई नई परंपरा नहीं है। पुराणों के अनुसार, ये व्रत द्वापर युग से चल रहा है। हज़ारों सालों से भारत में लोग इस नियम से निर्जला एकादशी करते रहे हैं।

 

इस व्रत से क्या मिलता है?

 

शास्त्र कहते हैंजो भी व्यक्ति पूरे नियम और श्रद्धा से निर्जला एकादशी करते हैं, उन्हें सालभर की सभी एकादशियों जितना फल मिलता है। भगवान विष्णु की खास कृपा मिलती है, पापों का नाश होता है, और भक्ति, संयम, आत्मशुद्धि सबमें बढ़ोतरी होती है।

 

लेकिन याद रखने वाली बात ये हैव्रत का मकसद सिर्फ पुण्य कमाना नहीं है। असली बात तो भगवान के प्रति प्रेम, इंद्रिय-निग्रह और नाम-स्मरण में मन लगाना है। अगर सिर्फ भूखे रह गए और भगवान को याद ही नहीं किया, तो बात अधूरी रह जाती है।

 

वैष्णव परंपरा में एक खास स्थान
 

वैष्णव मत में एकादशी को भगवान विष्णु का सबसे प्रिय दिन माना गया है। इस दिन हरिनाम जप, गीता और भागवत का श्रवण, विष्णु-कृष्ण की पूजा, और रात भर जागरण का भी अलग महत्व है।

 

एकादशी का सार यही हैरुखा-सूखा खाना छोड़ने भर का नाम नहीं। असल उपवास तो मन का हैमन संसार से हटे और भगवान के चरणों में लगे।

 

श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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