श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 13
श्लोक 31
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।। १३.३१।।
हिंदी भावार्थ:
हे कौन्तेय! परमात्मा का कोई आरंभ नहीं है और वे प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। इसलिए परमात्मा को अविनाशी और शाश्वत कहा गया है। वे प्रत्येक शरीर में विद्यमान होते हुए भी शरीर द्वारा किए जाने वाले कर्मों में स्वयं बंधते नहीं हैं। शरीर संसार के कार्यों में लगा रहता है, उसमें परिवर्तन आते रहते हैं, लेकिन परमात्मा इन परिवर्तनों से अछूते और अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहते हैं।
English Meaning:
O Kaunteya, the Supreme Self is eternal, beginningless and untouched by the qualities of material nature. Therefore, it remains imperishable. Although the Supreme Presence dwells within the body, it does not become bound by the activities performed through the body. The body may experience change, action and limitation, but the Supreme Self remains beyond these temporary conditions.आध्यात्मिक व्याख्या:
इस श्लोक में श्रीकृष्ण शरीर और परमात्मा के बीच के अंतर को समझाते हैं। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है, उसकी इच्छाएँ बदलती हैं और उसके माध्यम से अनेक प्रकार के कर्म होते हैं। लेकिन परमात्मा इन भौतिक परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होते। मनुष्य जब अपने वास्तविक आत्मिक स्वरूप को समझने का प्रयास करता है, तब उसे यह अनुभव होने लगता है कि उसका अस्तित्व केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
श्लोक 30
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।। १३.३०।।
हिंदी भावार्थ:
जब मनुष्य अपनी ज्ञान-दृष्टि से यह समझने लगता है कि संसार में दिखाई देने वाले असंख्य जीव और उनके अलग-अलग रूप वास्तव में उसी एक परम आधार में स्थित हैं, तथा इसी एक परम सत्ता से सृष्टि का विस्तार हुआ है, तब उसकी दृष्टि बाहरी भेदों से ऊपर उठने लगती है। ऐसी गहरी समझ के द्वारा वह ब्रह्म के सत्य को जानने और ब्रह्म की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ता है।
English Meaning:
When a person begins to see beyond the apparent differences among countless living beings and recognizes that all of them rest upon one Supreme Reality, he also understands that the vast diversity of creation has its origin in that same eternal source. With such spiritual insight, his understanding rises beyond external distinctions and moves toward the realization of Brahman.सरल व्याख्या:
दुनिया में हमें हर जीव अलग दिखाई देता है। किसी का शरीर अलग है, किसी का स्वभाव अलग है और किसी का जीवन अलग परिस्थितियों में चलता है। फिर भी श्रीकृष्ण यहाँ मनुष्य को उस गहरी एकता को देखने की प्रेरणा देते हैं जो इन सभी भिन्न रूपों के पीछे मौजूद है।जिस प्रकार एक ही आकाश अनेक स्थानों और दिशाओं में अलग-अलग दिखाई देता हुआ भी वास्तव में एक ही है, उसी प्रकार सृष्टि में अनेकता दिखाई देने पर भी उसका मूल आधार एक परम सत्य है। जब साधक की दृष्टि केवल बाहरी रूपों तक सीमित नहीं रहती और वह इस एकत्व को समझने लगता है, तब उसकी आध्यात्मिक समझ और गहरी होती जाती है।
